पवित्रता – Holiness – Written by डॉ. श्रीमती शीला लाल

पवित्रता एक ऐसा गुण है जिसके बारे में हम आजकल बहुत कम सुनते है जब कभी हम इसके बारे में सुनते भी हैं तो इसका संबंध शारीरिक अभिलाषाओं के ( Sexual ) संदर्भ में होता है लेकिन पवित्रता इतनी छोटी बात नहीं है बाइबिल हमसे वैचारिक और व्‍यवाहारिक पवित्रता की अपेक्षा करती है ताकि हम अपने भेजने वाले के समान पवित्र बने। यह मांग है एक ईमानदार समर्पित इच्‍छा की वह करने जो सही है एक प्रतिज्ञा है वह करने की जिसका आदेश ईश्‍वर के वचन से हमें मिलता है प्रभु यीशु मसीह ने जब मसीही जीवन शैली के सिद्धांत पहाड़ी उपदेश द्वारा धन्‍य वचन के रूप में हमें दिये तो उन्‍होंने मन की शुद्धता को बहुत महत्‍व दिया और कहा- धन्‍य है वे जिनके मन शुद्ध है क्‍योंकि वे परमेश्‍वर को देखेंगे। (मत्ती 5:8) यहां जिस बात की ओर प्रभु हमारा ध्यानार्षित करना चाहते है वह यह हैं कि मानवीय हृदय या मन जो हमारे अस्तित्‍व का आधार है जिससे हमारी इच्‍छायें हमारी भावनाएं और हमारे विचार मथंन प्रत्‍यक्ष और परोक्ष रूप में  जुड़े रहते हैं उसे हमें यपाप से से रिक्‍त करना है शुद्ध और पवित्र बनना है कि उसमें ईश्‍वर का वास हो सके बिना इसके केवल हम होठों से ईश्‍वर की स्‍तुति करते है लेकिन वह हममें नहीं वास्‍तव में हमने उसे नहीं जाना न पहचाना। आइये देखे कि बाइबिल इस पवित्रता के सबंध में क्‍या कहती है और हम लोग जो स्‍वयं को मसीह का अनुयायी कहते है उनसे किस प्रकार इन वचनों से प्रभावित होकर उसके अनुसार जीवन यापन की अपेक्षा हैं।

1. स्‍वयं को अनावश्‍यक परीक्षाओं के मार्ग में मत डालियेः- आपसे बेहतर आपकी मनः स्थिति कोई नहीं जानता यदि आप नशे से बचना चाहते है और दोस्‍तों की संगति में ऐसा करने को बाध्‍य होते हैं तो ऐसे दोस्‍तों से ऐसी पार्टियों से दूर रहिये आप अपने चरित्र की कमजोरियों को भी जानते हैं चाहे वह अश्‍लील साहित्‍य अश्‍लील फिल्‍मों की बात हो एकांत में नैतिक पतन की संभावनाए हो आप अपनी कमजोरियों को जानते हैं इसलिए आपको ऐसी परिस्थितियों से बचना है पढ़ि‍ये याकूब 1:14-15 जहां लिखा है ‘‘परन्‍तु प्रत्‍येक व्‍यक्ति अपनी ही अर्भिलाषा द्वारा खिंचकर व फंसकर परीक्षा में पड़ता है और जब अभिलाषा गर्भवती होती है तो पाप को जनती है और जब पाप हो जाता है तो मृत्‍यु को उत्‍पन्‍न करता है।

2. अपने विचारों के विषय पर गौर कर उसे नियंत्रि‍त कर सही उचित बातों पर ध्‍यान करेः- अपने दिलोदिमाग में यह बात बिलकुल न आने दे कि आजकल यह सब चलता है ऐसा सोचकर आप स्‍वयं को संसार की गंदगी की कीचड़ में फंसा लेंगे और परमेश्‍वर से उसकी अपेक्षाओं से आशीषों से दूरा हो जायेगें। 2तिमुथियुस  22:23 में लिखा है ‘‘जवानी की अभिलाषाओं से भाग और जो लोग शुद्ध हृदय से प्रभु का नाम लेते है उनके साथ धार्मिकता विश्‍वास प्रेम और शान्ति का अनुसरण कर परन्‍तु मूर्ख और अज्ञानपूर्ण विवादों से यह जानकर अलग रह कि इनसे झगड़े उत्‍पन्‍न होते हैं।’’

3. हृदय के पापों से भी सावधान रहः- बार बार बाइबिल हमें यह बतलाने का प्रयास करती है कि परमेश्‍वर हमारे हृदयों को जांचना है जो बात हमारे हृदय में है वही हमारे वचनों और कार्यो के द्वारा निकलती है लोगों को दिखाई देती है उसके अनुसार हमारा व्‍यक्तित्‍व बनता है है मत्‍ती 5:27-28 में प्रभु यीशु स्‍वयं कहते है ‘‘तुम सुन चुके हो कि कहा गया था व्‍यभिचार न करना परन्‍तु मैं तुमसे कहता हूं कि जो कोई किसी स्‍त्री को कामुकता से देखे वह अपने मन में उसे व्‍यभिचार कर चुका’’

4. अनैतिक संबंधों से बचें:- परमेश्‍वर ने बार बार बाइ‍बिल के माध्‍यम से हमें यह चितौनी  दी है कि हम अनैतिक संबंधों क पाप से बचे विवाह से बाहर अन्‍य प्रकार के शारीरिक संबंध पाप है। ये हमें अपवित्र करते है। 1थिस्‍सलुनीकियों 4:1-8 ध्‍यान पूर्वक पढ़े जहां लिखा है- ‘‘अंत में हे भाईयों हम तुम से प्रभु यीशु में निवेदन करते और तुम्‍हे समझाते है कि जैसे तुमने योग्‍य चाल‍ चलने और परमेश्‍वर को प्रसन्‍न करने की शिक्षा पाई है जैसा कि तुम सचमुच चलते भी हो वैसे ही और भी अधिक बढ़ते जाओ क्‍योंकि तुम जानते हो कि हमने प्रभु यीशु केक अधिकार से तुम्‍हे कौन कौन अर्थात् व्‍यभिचार से बचे रहो कि तुम में से प्रत्‍येक व्‍यक्ति अपनी पत्‍नी को आदर और पवित्रता के साथ प्राप्‍त करना जाने अन्‍य जातियों के समान कामुक होकर नहीं जो परमेश्‍वर को नहीं जानते कि इन बातों में कोई भी अपने भाई का अपराध न करे और न उसे ठगे क्‍योंकि प्रभु इन सारी बातों का बदला लेने वाला है जैसा कि हमने तुम्‍हे बतलाया था तथा गंभीरता पूर्वक चिताया भी था क्‍योंकि परमेश्‍वर ने हमें अशुद्ध होने के लिये नहीं परन्‍तु पवित्र होने के लिये बुलाया है परिणाम स्‍वरूप जो इसे अस्‍वीकार करता है वह मनुष्‍य को नहीं वरन् परमेश्‍वर को अस्‍वीकार करता है जो तुम्‍हे अपना पवित्रात्‍मा देता है।

5. यदि आप परीक्षा में फंसकर गिर जाते है तरे पश्‍चाताप के साथ परमेश्‍वर से क्षमा मांगे और अपने हृदय विचारों और इच्‍छाओं को पवित्र करें :- जब तक आप ऐसा करेंगे नहीं आप पाप की जकड़न अपने जीवन व व्‍यवहार में अनुभव करेंगे आप स्‍वतंत्र अनुभव नहीं कर सकते और इसलिये बिना ऐसा किये आप सच्‍ची शांति ईश्‍वरीय प्रेम अनुग्रह को भी अनुभव नही कर सकते। वचन के दर्पण में देखकर आपको सही सोचना है सही कामना करना है 1 यूहन्‍न 1:9 में इसकी प्रतिज्ञा है ‘‘यदि हम अपने पापों को मान लें तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्‍वासयोग्‍य और धर्मी है।’’

6. निंरतर अनन्‍त के संदर्भ में सोचेः- मानव जीवन थोड़े दिनों का और वह हमें देता है वह‍ अनश्‍वर है लेकिन मानव सांसारिकता के पीछे भागकर इसे नष्‍ट कर देता है मानव शरीर मिट्टी का बना मिट्टी में मिल जाता है लेकिन आत्‍मा प्रभु यीशु में ईश्‍वर की नज़दीकी में अनन्‍त काल के लिये रह सकती लेकिन इसके लिए प्रयास हमको इसी संसार में इसी जीवन में करना है ईश्‍वर ने आपको चुनाव का अवसर दिया बहुमूल्‍य जीवन दिया है इसे व्‍यर्थ गंवोर पाप में पड़कर आप अनन्‍त जीवन से भी वंचित हो जाते है 2 पतरस 3:10 में लिखा है जबकि ये सब वस्‍तुएं  इस प्रकासर नाश होने पर हैं तो तुम्‍हे पवित्र चाल चलन और भक्ति में किस प्रकार के लोग होना चाहिये।’’

7. ऐसा जीवन जिये जो ईश्‍वर को प्रसन्‍न करने वाला होः- अपने जीवनों को समर्पित संयामित कीजिये की वे पवित्रात्‍मा की अगुवायी में ईश्‍वर के वचन योजनानुसार संचालित हो सके। केवल यही एक तरीका है जिससे हम ऐसा जीवन जिये जो ईश्‍वर के वचन योजनानुसार संचालित हो सके। केवल यही एक तरीका है जिससे हम ऐसा जीवन जिये जो ईश्‍वर को प्रसन्‍न करने वाला और ग्रहण योग्‍य हो रोमियों 8:5-8 में लिखा है ‘‘क्‍योंकि शारीरिक व्‍यक्ति शरीर की बातों पर मन लगाते हैं। शरीर पर मन लगाना तो मृत्‍यु है परन्‍तु आत्‍मा पर मन लगाना जीवन और शांति है क्‍योंकि शारीरिक मन तो परमेश्‍वर से शत्रुता करता है वह  न तो परमेश्‍वर की व्‍यवस्‍था के आधीन है और न ही हो सकता है जो शारीरिक हैं वे परमेश्‍वर को प्रसन्‍न नहीं कर सकते।’’

प्रेम – Love – Written by डॉ. श्रीमती शीला लाल

बाइबिल में हमें एक संदर्भ ऐसा मिलता है जब प्रभु यीशु से पूछा गया है कि ईश्‍वर की सबसे महत्‍वपूर्ण मुख्‍य आज्ञा कौन सी है तब यीशु ने उसे उत्‍तर दिया। सब आज्ञाओं में से यह मुख्‍य है- हे इस्‍त्राएल (मेरे लोगों) सुन प्रभु हमारा परमेश्‍वर एक ही है प्रभु है और तू प्रभु अपने परमेश्‍वर से अपने सारे मन से और अपने सारे प्राण से और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना और दूसरी यह कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना इस ये बड़ी और कोई आज्ञा नहीं। (मरकुस 12:29-31)

ये दो सबसे प्रमुख आज्ञायें है क्‍यों कि जब आप अपने प्रळज्ञु परमेश्‍वर से अपनी सारी बु्द्धि‍ मन, प्राण, शक्ति, से प्रेम रखेंगे तब आप वही करना चाहेंगे जिससे वह प्रसन्‍स्‍न हासे उसी तरह जब आप दूसरों से सचमुच इतना प्रेम करेंगे जैसा आप स्‍वयं से करते हैं तब आप वास्‍तव में उनके कुशल क्षेम या कल्‍याण के प्रति जागरूक रहें और यह आपके व्‍यवहार से परिलक्षित होगा आपको निरन्‍तर यह बात ध्‍यान में रखना हैं कि परमेश्‍वर को हम इस तरह प्‍यार करना सीखें इसके पूर्व परमेश्‍वर ने हम जगत के लोगों से असीमित प्रेम किया यूहन्‍ना 3:16 में हम पढ़ते है परमेश्‍वर ने जगत ये ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया ताकि  तो कोई उस पर विश्‍वास करें वह नाश न हो परन्‍तु अनन्‍त जीवन पाये ईश्‍वर का सर्वोत्‍तम दान प्रभु यीशु का सर्वोच्‍च बलिदान सम्‍पूर्ण मानवता के लिये उनके असीमित प्रेम का ही द्योतक है इसीलिये कहा जाता है सुसमाचार (उद्धार का शुभ संदेश मसीही धर्मानुसार) एक शब्‍द में प्रेम।

बाइबिल हमें परमेश्‍वर के प्रेम  की चरमसीमा बतलाते हुए कहती है कि परमेश्‍वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है कि जब हम पापी ही थे तभ्‍ज्ञी मसीह हमारे लिये मरा। (रोमियो 5:8)  जब हम इस सत्‍यता को स्‍वीकार लेते है तो हमारा जीवन परिवर्तित्‍ हो जाता है हमारा ईश्‍वर के प्रति प्रेम निरन्‍तर बढ़ता जाता है आइये बाइबिल के कुछ ऐसे संदर्भो का अध्‍ययन करें जिससे हमें यह शिक्षा और मार्गदर्शक मिलता है कि हमारा प्रेम ईश्‍वर के प्रति और दूसरे मनुष्‍यों के प्रति किस प्रकार का होना चाहिए।

(1) हमारे जीवन का प्रथम और प्रमुख प्रेम ईश्‍वर होना चाहिएः- इससे पहले कि हम आपस में एक दूसरे से प्रेम करें हमें परमेश्‍वर के अपने प्रति प्रेम को समझना है और सम्‍पूर्ण ह्रदय से बुद्धि‍ से शक्ति से उससे प्रेम करना है (देखिये मत्‍ती 22:37-38) उसने उस से कहा तू परमेश्‍वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और सारे प्राण और सारी बुद्धि‍ के साथ प्रेम रख बड़ी और प्रमुख आज्ञा तो यही है।

(2) प्रभु यीशु का प्रेम हमारे प्रेम के लिये आदर्श होना चाहिएः- हमारा दूसरों के प्रति एक सच्‍चे मसीही विश्‍वासी के रूप में प्रभु यीशु के प्रेम का अनुसरण होना चाहिए जैसा उन्‍होंने इस जगत के लोगों से (पापियों से भी) किया। (देखिये इफीसियों 5:1-2) इसीलिये प्रिय, बालको की नाई के सदृश्‍य बनो और प्रेम में चलो जैसे मसीह मे भी तुम से प्रेम किया और हमारे लिये अपने आपको सुखदायक सुगन्‍ध के लिए परमेश्‍वर कें आगे भेंट करके बलिदान कर दिया।

(3) प्रेम सब आत्मिक वरदापों से बढ़‍कर हैः- एक मसीही जो इस बात को समझता है कि परमेश्‍वर का प्रेम वास्‍तव में क्‍या है और उसके प्रेम का प्रदर्शन अपने व्‍यवहारिक जीवन के द्वारा निरन्‍तर करता है वह दूसरों के लिये सब बातों व शिक्षाओं में सच्‍चा मसीही गवाह ठहरता है। (पढि़ये ईश्‍वरीय प्रेम का अध्‍याय 1 कुरिन्थियों 1:1-13 पद तक पूरा पढि़ये)

(4) हमारा परमेश्‍वर के प्रति प्रेम ही हमें उसकी सेवा के लिए तैयार करता हैः- हमारा प्रेम ईश्‍वर के प्रति कितना प्रगाढ़ है यह सीधे हमारी दूसरों के प्रति व्‍यवहार व हमारी सेवकाई को प्रभावित करता है (यूहन्‍ना 21:15-17 में इसका स्‍पष्‍ट उदा. है देखिये- भोजन करने के बाद यीशु ने शमौन पतरस से क‍हा हे शमौन यूहन्‍ना के पुत्र क्‍या तू इनसे बढ़कर मुझसे प्रेम रखता है उसने उससे कहा हां प्रभु तू तो जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं उसने उससे कहा हे शमौन यूहन्‍ना के पुत्र क्‍या तू मुझ से प्रेम रखता है उसने कहा मरी भेड़ों की (विश्‍वासियों, अनुयायियों) रखवाली कर उसने तीसरी बार उससे कहा हे शमौन यूहन्‍ना के पुत्र क्‍या तू मुझ से प्रीति रखता है और उसने कहा हे प्रभु तू तो सब कुछ जानता है तू यह जानता है कि मैं तुझसे प्रीति रखता हूं यीशु ने उससे कहा मेरी भेड़ों को चरा।

(5) दूसरों के प्रति हमारा प्रेम हमारी आत्मिक दशा का दर्पण हैः- हम अपने सम्‍पर्क में आने वाले लोगों के साथ किस प्रकार अपने व्‍यवहार से ईश्‍वर के प्रेम को प्रदर्शित करते हैं यह बतलाता है  कि हममें ईश्‍वर का वास है हम प्रतिदिन आत्मिक रूप से उसके साथ साथ चल रहें हैं देखिये (यूहन्‍ना 2:9-11) जो कोई यह कहता है कि मैं ज्‍योति में हूं और अपने भाई से प्रेम रखता हूं वह ज्‍योति में रहता है और ठोकर नहीं खा सकता पर जो कोई अपने भाई से बैर रखता है वह अन्‍धकार (पाप) में है और अन्‍धकार (पाप) में चलता है और नहीं जानता की कहां जाता है क्‍योंकि अन्‍धकार (पाप) ने उसकी आंखे अन्‍धी कर दी है।

(6) हमारा प्रेम हम निरन्‍तर बढ़ने वाला होना चाहिएः- जैसे जैसे हम परमेश्‍वर की नज़दीकी में बढ़ते है वैसे वैसे हमारे दूसरों के प्रति प्रेम में भी वृद्धि‍ होना चाहि‍ए (1 थिसलुनिकियो 3:12-13 देखिये) और प्रभु ऐसा करे कि तुम्‍हारा प्रेम भी आपस में और सब मनुष्‍यों के साथ बढ़े कि और उन्‍नति करता जाए ताकि वह तुम्‍हारे मनों को ऐसा स्थिर करें कि जब हमारा प्रभु यीशु अपने सब पवित्र लोगों के साथ आये तो वे हमारे परमेश्‍वर और पिता के साम्‍हने पवित्रता में निर्दोष ठहरें।

क्षमा – Forgiveness – Written by डॉ. श्रीमती शीला लाल

मसीही जीवन का एक प्रमुख सिद्धांत है क्षमा। यह हमारे विश्‍वास की स्‍वभाविक प्रतिक्रिया बनना चाहिये प्रभपु यीशु ने अपने जीवन से इतना सर्वोतकृष्टि उदाहरण हमारे सामने रखा जब निर्दोष प्रभु यीशु पर दोष लगाकर भीड़ उन्‍हें अपराधियों की तरह कोड़े मारका पत्‍थर मारते हुए क्रूस पर चढ़ाने ले गये उन पर थूका थप्‍पड़ मारे ताने कसे तब भी क्रूस पर चढ़कर लस्‍वये को ऐसे लोगों के पापों के खातिर बलिदान करते हुए क्रूस की भयानक यातना और पीड़ा सहते हुए सिर पर कांटों का ताज हांथ पेरों में कीले ठुके होने पर भी यीशु ने ऐसे लोगों के लिये अपने स्‍वर्गीय पिता से प्रार्थना की जिसका वर्णन (लूका 23:35 में है) हे पिता इन्‍हें क्षमा कर क्‍योंकि ये नहीं जानते कि ये क्‍या कर रहें है। यह च्‍यवहार, क्षमा का यह नमूना अपने आप में अनोखा था जिसने यीशु के साथ क्रूस पर टंगे डाकू का जीवन परिवर्तन कर दिया उसने जान लिया कि इस मसीहा क राज्‍य इस जगत का नहीं क्षणिक नहीं वह तो स्‍वर्ग का है अनन्‍त का है और उसका जीवन बदल गया उसने वहां पश्‍चताप किया उसे उद्धार मिल गया प्रभु का अनुग्रह और क्षमा दान मिल गया। क्‍योंकि प्रभु यीशु हमारे पापों को पूर्ण रूप से पश्‍चाताप कर उसे न दुहराने की प्रतिज्ञा करते हैं वे चाहते है जैसे उन्‍होंने हमारे अपराध क्षमा किये वैसे ही हम भी दूसरों के अपराध क्षमा करें। (इफिसियों 4:32-5:1)  में बाइबिल हमें सिखलाती है एक दूसरे के ऊपर कृपाल और करूणामय हो और जैसे परमेश्‍वर ने मसीह में तुम्‍हारे अपराध क्षमा किये वैसे हि तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो। इसलिये प्रिय, बालको की नाई परमेश्‍वर के सदृश्‍य बनों। बाइबिल हमारी शिक्षा के लिये हमें क्षमा के विभिन्‍न संदर्भो से प्ररित करती हैं।

(1) क्षमा पहले ईश्‍वर के द्वार प्राप्‍त होती हैः- हमें दूसरों को क्षमा करते समय इस बात को निरन्‍तर स्‍मरण रखना चाहिये कि इस संसार में तो काई धर्मी नहीं एक भी नहीं। मनुष्‍य स्‍वभाव से नित्‍य निरन्‍तर पाप करता है गलातियां करता है जब हमारा स्‍वर्गीय पिता अपने प्रेम व अनुग्रह के कारण हमें निरन्‍तर क्षमा करता है तो हमें भी दूसरों के साथ ऐसा ही करना चाहिये (देखिये मरकुस 11:25) और जब कभी तुम खड़े हुए प्रार्थन करते हो तो हमारे मन में किसी की ओर से कुछ विरोध हो तो उसे पहले क्षमा करों।

(2) क्षमा की कोई सीमा नहीं होतीः- एक मसीही के लिये क्षमा को सीमाओं में बांधना संभव नहीं न ही यह उचित है क्‍योंकि कोई भी गलत कार्य या पाप न हो यह उचित है क्‍योंकि कोई भी गलत कार्य या पाप ईश्‍वर की दृष्टि में इतना बड़ा या छोटा नहीं कि वह उसे क्षमा न कर सके (देखिये मत्‍ती 18:21-35 तब पतरस ने आकर उससे कहा, ‘‘प्रभु, मेरे भाई कितनी बार मेरे विरूद्ध अपराध करता रहे कि मैं उसे क्षमा करूं ? क्‍या सात बार तक ? यीशु ने उससे कहा, ‘‘मैं तुझ से यह नहीं कहता कि सात बार तक ही, वरन् सात बार के सत्‍तर गुने तक। ’’यानि कोई गिनती की बाता नहीं कोई सीमा नहीं असीमित क्षमादान इसीलिये स्‍वर्ग के राज्‍य की तुलना किसी ऐसे राजा से ही जा सकती है जिसने अपने दासों से लेखा लेना चाहा जब वह लेखा लेने लगा तो उसके सामने एक मनुष्‍य लाया गया जिस पर करोड़ों रूपय का ऋण था। र जब उसके पास ऋण चुकाने को कुछ न था तको उसके स्‍वामी ने आज्ञा दी कि उसे और उसकी स्‍त्री, बच्‍चे, तथा जो कुछ उसके पास है, सब बेचकर ऋण चुका दिया जाए। इस पर दास गिर कर उसे दण्‍डवत् किया और कहा, ‘ स्‍वामी र्धर्य रख। मैं सब कुछ चुका दूंगा।’ तब उस दास ने स्‍वामी ने तरस खा कर उसे छोड़ दिसर और ऋण भी क्षमा कर दिया। परन्‍तु वह दास बाहर निकला और उसकी भेंट संगी दासों में से उक से हुई जो उसका सौ रूपये का ऋणी था। उसने इसे पकड़ा और इसका गला दबाकर कहा, ‘मेरा ऋण चुका !’ इस पर उसका संगी दास गिरकर अनुनय-विनय करने लगा, ‘धैर्य रख मैं सब चुका दूंगा।’ फिर भी वह न माना और उसे तब तक के लिए बन्‍दीगृह में डाल दिया  जब तक की वह ऋण न चुका दे यह देख कर उसके संगी दस अत्‍यन्‍त दुखी हुए और उन्‍होंने जाकर अपने स्‍वामी को यह घटना सुनाई। तब उसके स्‍वामी ने उसे बुलाकर कहा, हे दुष्‍ट दास ! इसीलिए कि तूने मुझ से विनती की, मैंने तेरा सारा ऋण क्षमा कर दिया था। तो फिर मैंने जिस प्रकार तुझ पर दया की, क्‍या उसी प्रकार तुझे भी अपने संगी दास पर दया नहीं करनी चाहिये थी ? और उसके स्‍वामी ने क्रोध से भरकर उसे यातना देने वालों को सौंप दिया कि ऋण चुकाने तक उन्‍ही के हाथों में रहे। इसी प्रकार यदि तुम में से प्रत्‍येक अपने भाई को ह्रदय से क्षमा न करे तो मेरा स्‍वर्गीय पिता भी तुम्‍हारे साथ वैसा ही करेगा।’’

(3) क्षमा में चुनाव का स्‍थान नहीं हैः- आपको मसीही धर्मानुसार इस बात की अनुमति नहीं कि आप कुछ लोगों को क्षमा करे कुछ नहीं या आप कहें आप फलां बात क्षमा कर सकते हैं फलां नहीं आपको यह स्‍मरण रखना है कि यदि ईश्‍वर भी आपके साथ ऐसा करे तब आपका क्‍या होगा (पढि़ये मत्ती 5:43-48) तुम यह सुन चुके हो कि कह गया कि अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना और बैरी से बैर परन्‍तु मैं तुम से यह कहता हूं कि अपने बैरियों से प्रेम रखों और अपने सताने वालों के लिए प्रार्थना करो जिससे तुम अपने स्‍वर्गीय पिता की संतान ठहरोगे क्‍योंकि वह भलों और बुरों दोनों पर अपना सूर्य उदय करता है और धमिर्यो और अधर्मियों दोनों पर मेह बरसाता है।

(4) क्षमा हमारे द्वारा खड़ी की गयी दीवारे तोड़कर हमें स्‍वतंत्र करता हैः- जब आप क्षमा का चुनाव करते है या पश्‍चाताप कर ईश्‍वर से क्षमा प्राप्‍त करते है तब आप अपने हृदय और अन्‍तरात्‍मा में आपके द्वारा उठाई गई अलगाव की दीवारों को गिराते हैं आप वास्‍तव में स्‍वतंत्र होते हैं और आपका संबंध बेहतर  होता है दृढ़ होता है, विकसित और स्‍वायी होता हैं। (कुलुस्सियों 3:12-15) इयीलिए परमेश्‍वर के चुने हुओं की नाई जो पवित्र और प्रिय है बड़ी करूणा और भलाई और दीनता और नम्रता और सहनशीलता धारण करो और यदि किसी को किसी पर दोष देने का कोई कारण हो तो एक दूसरे की सह लो और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो जैसे प्रभु ने तुम्‍हारे अपराध क्षमा किये वैसे ही तुम भी करो।

न्‍याय

न्‍याय

बाईबल हमें सिखाती हैं कि सभी नैतिक प्राणी जगत के अंतिम दिन में परमेश्‍वर के न्‍याय सिंहासन के सामने लाए जाएंगे। यीशु मसीह ने उन चिन्‍हों के विषय में बताया जो उस अंतिम दिन से पहले होने वाले हैं। वे इस प्रकार हैं: मत त्‍याग, झूठे भविष्‍यद्वक्‍ताओं का बढ़ना , ख्रीस्‍त विरोधी का आगमन जो परमेश्‍वर के लोगों को सताएगा और राजनैतिक तौर से विश्‍व पर नियंत्रण करेगा, युद्ध, भूकम्‍प, आकाल, बुराई का बढ़ना, पंथों का बढ़ना, एवं अंतरिक्ष में चिन्‍ह (मत्ति 24)। इस‍के पश्‍चात परमेश्‍वर का पुत्र आसमान में अपने सामर्थी स्‍वर्गदूतों के साथ प्रगट होगा (2थेस.1:7)। वह इस बार अपने लोगों का उद्धार एवं संसार का न्‍याय के लिए प्रगट होगा (इब्रा.9:28)। मसीह में जो मर गए हैं वे पहले जिलाए जाएंगे; फिर जो शिष्‍य जीवित हैं वे प्रभु के साथ हमेशा रहने के लिए उठा लिए जाएंगे (1थेस. 4:16,17)। शैतान और उसके दूत नरक में डाल दिए जाएंगे (मत्ति 25:41; प्रकाश.20:10)। वे जिनका नाम जीवन की पुस्‍तक (यीशु की पुस्‍तक) में नही लिखा गया है उन्‍हें आग की झील मे डाल दिया जायेगा (प्रकाश.20:15) क्‍योंकि उनका न्‍याय उन के कार्यों के अनुसार किया जाएगा (रोम.2:5,6; यहूदा 15)।

मसीह में विश्‍वासयोग्‍य जो रहेंगे वे स्‍वर्ग राज्‍य के वारिस होवेंगे (प्रकाश.21:7)।

बाईबल

बाईबल

बाईबल मसीह यीशु के विश्‍वास द्वारा उद्धार पाने के लिए परमेश्‍वर द्वारा दिया गया शिक्षण ग्रंथ है (2तिम.3:15)। यह उन पवित्र लोगों के द्वारा लिखी गई थी जो पवित्र आत्‍मा की भविष्‍यद्वाणी के अभिषेक के द्वारा चलाये जाते थे (इब्रा.1:1; 2पत.1:20,21)। इसलिए, यह परमेश्‍वर का प्रेरित वचन के रूप में जाना जाता है (2तिम.3:16)। बाईबल को हम सांसारिक रीति से नही समझ सकते हैं। उद्धार के निमित शिक्षा हमें पवित्र आत्‍मा के द्वारा प्राप्‍त होता हैं (1कुरु.2:10-16)। इसलिए, एक अनात्मिक व्‍यक्ति अत्मिक बातों को न तो समझ सकता है न उनहें ग्रहण कर सकता है। केवल बाईबल ही दैवीय ज्ञान का एकमात्र अभ्रांत (तृटि रहित) स्रोत है जिसे परमेश्‍वर ने मनुष्‍यों को दिया है (प्रकाश.22:6)।

बाईबल या पवित्र शा‍स्‍त्र यीशु मसीह के विषय में गवाही देती है (यूह.5:29; गल.3:8); इसलिए, कहा गया है कि ‘यीशु की गवाही भविष्‍यद्वाणी की आत्‍मा है’ (प्रकाश. 19:10)। विश्‍वासी को पवित्र शास्‍त्रों को पढ़ने और अध्‍ययन करने के लिए बुलाया गया हैं (भजन 1:2)। बाईबल के वचनों का तोड़ना मरोड़ना या उसमें अन्‍य बातों को जोड़ना या उसमे से निकालना सख्‍त रूप से प्रतिबंधित हैं (2पत.3:16; प्रकाश.22:18;19)।


कलीसिया

कलीसिया

कलीसिया प्रभु यीशु मसीह के शिष्‍यों का समुदाय हैं। वह मेमने की पत्नि (प्रकाश्‍.21:9; इफि.5:25-27; प्रकाश.19:7), मसीह की देह (1कुरु.12:27), एवं परमेश्‍वर का मंदिर (1पत.2:5,6; इफि.2:21,22; 1कुरु.3:16,17) के रूप में भी जानी जाती है। कलीसिया ‘प्रेरितों और भविष्‍यद्वक्‍ताओं की नेव पर जिस के कोने का पत्‍थर मसीह यीशु आप ही है,’ बनायी गई है (इफि.2:20)। इसलिए, प्ररितों की शिक्षा एवं भविष्‍द्वाणी के द्वारा आत्मिक उन्‍नति कलीसिया के लिए बुनियादी हैं (प्रेरित 2:42; 15:32)। कलीसिया संगी विश्‍वासियों की संगति है। इसलिए, मसीहियों को आदेश दिया गया है कि वे आपस में इकटृठा होना न छोडें (इब्रा.10:25)। कलीसिया परमेश्‍वर का परिवार हैं; इसलिए, उस में एकता, सहयोग, उन्‍नति, एवं फलदायकता होना चाहिए (इफि.2:19; 1कुरु.1:10; यूह.13:35; गल.6:1,2)। कलीसिया विश्‍वक और स्‍थानीय दोनों है।

प्रभु यीशु मसीह कलीसिया की उन्‍नति के लिए उस में प्ररित, भविष्‍यद्वक्‍ता, सुसमाचार प्रचारक, शिक्षक, एवं पासवानों को नियुक्‍त करते हैं (इफि.4:11-12)। पवित्र आत्‍मा व्‍यक्तियों को अपने वरदानों से सुसज्जित करता हैं ताकि कलीसिया की उन्‍नति हो (1कुरु.12)। कलीसिया को बुलाया गया है कि वह यीशु मसीह के सुसमाचार को हर जाति में प्रचार करें, उनमे से शिष्‍य बनायें, और यीशु मसीह की शिक्षाओं को उन्‍हे सिखाएं (मत्ति 28:19-20)। यह प्रचार चिन्‍हों और अद्भुत कार्यों के साथ होता है जिन्‍हें प्रभु अपने वचन को प्रमाणित करने के लिए करता है (मरकुस 16:20; इब्रा. 2:4)।

कलीसिया के दो नियम हैं जल का बपतिस्‍मा (मत्ति 28:19) एवं प्रभु का मेज (1कुरु.11:23-29)।

यीशु मसीह अपनी कलीसिया के लिए पुन: पृथ्‍वी पर वापस लौटेगा। तब मसीह में जो मर गए हैं वे पहले जिलाए जाएंगे, फिर जो जीवित हैं वे उसके साथ बादलों में उठा लिए जाएंगे ताकि उसके साथ सदा के लिए रहें (1थेस.4:16,17)।

उद्धार

उद्धार

सुसमाचार यह घोषणा करता है कि सभी मनुष्‍य प्रभु यीशु मसीह पर विश्‍वास करने के द्वारा अपने पापों से छुटकारा प्राप्‍त कर सकते हैं। परमेश्‍वर ने यीशु मसीह को संसार में अपने बलिदान के मेमने के रूप में भेजा ताकि वह संसार के पापों के लिए प्रायश्चित करें (यूह.1:29)। यीशु मसीह का देह बलिदान के लिए पवित्रात्‍मा के द्वारा अभिषिक्‍त एवं अलग किया हुआ देह था (लूका 1:35; इब्रा. 10:5)। पवित्रात्‍मा ने यीशु मसीह के उन दु:खों को जो वह हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए सहने वाला था पुराने समय के अपने भविष्‍यद्वकताओं पर पहले से ही प्रगट कर दिया था (1पत.1:10,11)। मसीह अपने देहधारण एवं प्रायश्चित की मृत्‍यु के द्वारा मनुष्‍य एवं परमेश्‍वर के बीच में मध्‍यस्‍त बन गया; इस तरह, अपने शरीर का उस अनंत आत्‍मा के द्वारा बलिदान करके उसने हमारे लिए परमेश्‍वर की उपस्थिति में प्रवेश का मार्ग बना दिया (इब्रा.10:19;20)। इस प्रायश्चित की मृत्‍यु एवं पुनुरुत्‍थान (मृत्‍कों में से जी उठने) के द्वारा वह परमेश्‍वर और मनुष्‍य के बीच में मेल मिलाप का मार्ग बन गया (रोम.5:10; इब्रा.1:3)।

जो इस उद्धार के दान को ठुकरायेंगे वे अपने पापदोष में पड़े रहेंगे और ‘प्रभु के सामने से, और उसकी शक्ति के तेज से दूर होकर अनन्‍त विनाश का दण्‍ड पाएंगे’ (2थेस. 1:9)। जो यीशु मसीह को अपने प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण करेंगे वे अंधकार की शक्ति से छुड़ाए जाकर प्रभु यीशु मसीह के राज्‍य में प्रवेश कराये जाएंगे (कुलु.1:13)। उनहे पुत्र होने एवं यीशु मसीह के संगी वारिस होने का अधिकार दिया गया हैं (यूह.1:12; रोम;8:17)।

उद्धार की आशीषें इस प्रकार से हैं:

  1. पापों से क्षमा (इफि.1:7)

  2. धर्मि ठहराया जाना (रोम.4:25)

  3. अनंत जीवन (यूह.3:16)

  4. स्‍वर्ग में नागरिकता (फिलि.3:20)

  5. अनंत मिरास (इब्रा.9:15)

  6. दुष्‍टात्‍माओं और बिमारियों पर अधिकार (लूका 10:19)

  7. पवित्रात्‍मा का फल (गल.5:22,23)

  8. एक महिमायुक्‍त पुनुरुत्‍थान (1कुरु.15:51-54)


मनुष्‍य

मनुष्‍य

परमेश्‍वर ने मनुष्‍य को छटवे दिन पुरुष और स्‍त्री के रूप में अपने ही स्‍वरूप और समानता में बनाया (उत्‍प.1:26-28)। वे परमेश्‍वर का आदर और महिमा को प्रतिबिम्बित करते थे और उनहें सारी सृष्टि पर हुकूमत दिया गया था (भजन 8:5; उत्‍प.1:28)। परमेश्‍वर ने मनुष्‍य को दैहिक, व्‍यक्तित्‍व, एवं आत्मिक स्‍वरूप में बनाया; इस कारण से मनुष्‍य शरीर, प्राण, एवं आत्‍मा हैं (उत्‍प.2:7; अय्यूब 32:8; सभो.11:5;12:7; 1थेस.5:23)। पहला मनुष्‍य आदम ने पाप किया और इसके द्वारा जगत में पाप और मृत्‍यु लेकर आया (रोम.5:12)। बाईबल बताती है कि आदम में सभों ने पाप किया, इसलिए मृत्‍यु हर मनुष्‍यों पर आ गया (रोम.5:12)। यह मृत्‍यु तीन रूप में हैं: आत्मिक मृत्‍यु (परमेश्‍वर से अलग होना और उसके साथ शत्रुता), शारिरिक मृत्‍यु (आत्‍मा का शरीर से अलग होना), एवं दूसरी मृत्‍यु (नरक में अनंत दण्‍ड) (इफि.2:1; कुलु.1:21; रोम.5:10; प्रकाश.21:8)। मनुष्‍य पाप के दण्‍ड के कारण मरनहार हो गया।

बाईबल बताती है कि ‘मांस और लोहू’ अर्थात नया जन्‍म प्राप्‍त नही किए मनुष्‍य स्‍वर्ग राज्‍य के वारिस नही हो सकते और न विनाश अविनाशी का अधिकारी हो सकता है (1कुरु.15:50)। इसलिए, उद्धार का एक मात्र मार्ग पवित्रात्‍मा के द्वारा विश्‍वास से नया जन्‍म प्राप्‍त करना ही है (यूह.3:5,6)। जब कोई यीशु मसीह का प्रभुत्‍व को स्‍वीकारता है तब वह पुराने संसार के दोष से मुक्‍त होकर प्रभु यीशु मसीह के आने वाले राज्‍य का वारिस हो जाता है। बाकी लोग इस संसार के ईश्‍वर अर्थात शैतान के आधीन रह जाते हैं (2कुरु.4:4; इफि.2:2; 1युह.5:19)।

दुष्‍टात्‍माएं

दुष्‍टात्‍माएं

दुष्‍टात्‍माएं वे दूत हैं जिन्‍होंने उस प्रधान दूत लूसिफर के साथ मिलकर परमेश्‍वर का विरोध किया था जो शैतान, अर्थात विरोधी, पुराना अजगर, परखनेवाला, दुष्‍ट, संसार का हाकिम, इस संसार का ईश्‍वर, हत्‍यारा, एवं झूठों का पिता के नाम से जाना जाता है) (यशा.14:12-15; यह.28:12-19; यूह.12:31; 2कुरू.4:4; मत्ति.4:3; 1यूह.5:19; यूह.8:44)। इस कारण से इन प्रेत आत्‍माओं के विषय में कहा गया है कि वे वही स्‍वर्गदूत है जिन्‍होंने ‘अपने पद को स्थिर न रखा’ (यहूदा 6)। वे गिरे हुए स्‍वर्गदूत हैं। वे परमेश्‍वर के कार्य का विरोध करते हैं (1थेस.2:18), लोगों को भरमाते हैं (प्रकाश.20:7-8), घमण्‍डी हैं (1तिम.3:6), अभक्ति को बढ़ावा देते हैं (इफि.2:2), क्रूर हैं (1‍पत.5:8), दोषारोपन करते हैं (अय्यूब 2:4), और मनुष्‍यों को अनेक वेदनाओं एवं बिमारियों से पीडित करते हैं (प्रेरित 10:38; मरकुस 9.25)। वे अविश्‍वासियों के शरीरों को कबज़ा करते हैं (मत्ति 8:16), किसी व्‍यक्ति में प्रवेश कर सकते हैं (लूका 22:3), किसी व्‍यक्ति के विचार को प्रभावित कर सकते हैं (प्रेरित 5:3), एवं जानवरों के शरीरों को भी वश में कर सकते हैं (लूका 8:33)।

एक विश्‍वा‍सी कभी भी दुष्‍टात्‍माओं से ग्रसित नही हो सकता हैं क्‍योंकि उसका शरीर पवित्र आत्‍मा का मंदिर हैं और उस में दुष्‍टात्‍माओं के लिए कोई जगह नही हो सकता (1कुरू.6:19; 10:21)।

दुष्‍टात्‍माएं भी परमेश्‍वर पर विश्‍वास करते हैं और उसके सन्‍मुख्‍ में भय के साथ थरथराते हैं (याकूब 2:19)। शैतान और उसके दुष्‍ट दूत परमेश्‍वर के न्‍याय के प्रतीक्षा में ही हैं (मत्ति 8:29; प्रकाश. 20:10)। यीशु मसीह के विश्‍वासियों को पुकारा गया है कि वे परमेश्‍वर के आधीन हो जाएं और शैतान का सामना करें (याकूब 4:7)। विश्‍वासियों का एक चिन्‍ह यह है कि वे दुष्‍टात्‍माओं को निकालेंगे (मरकुस 16:17)।

दुष्‍टात्‍माओं को निकालना

  1. एक विश्‍वासी के पास दुष्‍टात्‍माओं को निकालने का मसीह द्वारा दिया गया अधिकार है (मत्ति 10:1,8; मरकुस 16:17)। इस अधिकार का स्रोत मसीह यीशु ही है।

  2. मसीह ने  दुष्‍टात्‍माओं को परमेश्‍वर के आत्‍मा के द्वारा निकाला (मत्ति 12:28); इसलिए, एक विश्‍वासी के लिए आवश्‍यक है कि वह आत्‍मा से परिपूर्ण चाल चलें (गल.5:25)।

  3. प्रार्थना, उपवास एवं परमेश्‍वर के प्रति संपूर्ण समर्पण अनिवार्य है (मरकुस 9:29; याकूब 4:7)।

  4. विश्‍वासी को आत्‍माओं की परख के वरदान के लिए प्रार्थना करना चाहिए (1कुरु.12:10)।

  5. उसे दुष्‍टात्‍माओं के साथ, सामान्‍यत:, बात नही करना चाहिए (मरकुस 1:24)। वे भरमाने वाली आत्‍माएं हैं।

  6. विश्‍वासी इन प्रेतात्‍माओं को यीशु के नाम से निकालें (प्ररित 16:18)।

  7. दुष्‍टात्‍माओं को निकालते समय अपने आंखों को बंद न रखें; आप आदेश दे रहे हैं, प्रार्थना नही कर रहे; कभी कभी यह पाया गया है कि दुष्‍टात्‍माएं आक्रामक हो जाते हैं (मत्ति 17:15; प्रेरित 16:18)।

  8. विश्‍वासी दुष्‍टात्‍माओं को यह अनुमति न दें कि वे उसके विश्‍वास को, जो परमेश्‍वर, उसके वचन, एवं मसीह के पवित्र आत्‍मा की सामर्थ पर है, कमज़ोर करें। संदेह शैतान का एक महत्‍वपूर्ण शस्‍त्र है (उत्‍प.3:1; मत्ति 4:3-10)।

  9. हर छुटकारे की सेवकाई के दौरान परमेश्‍वर के सेवकों के मध्‍य क्रम एवं अनुशासन होना चाहिए; एक अधिकार के साथ सेवा करें और अन्‍य उसे प्रार्थना के द्वारा समर्थित करें (1कुरू.14:33)।

  10. सब प्रकार के ताबीज या जादू टोनें के चीजों को शरीर से दूर करें अन्‍यथा छुटकारे का कार्य नही होगा। इन चीजों को रखने के द्वारा व्‍यक्ति शैतानी ताकतों के लिए गढ़ स्‍थापित करता है (प्ररित 19:19)।

11.  छुटकारे पाए हुए व्‍यक्ति को पापों का अंगीकार, मन फिराव, एवं पवित्र आत्‍मा की भरपूरी में अगुवाई करें ताकि दुष्‍टात्‍माओं के लौटने की गंभीर दशा उत्‍पन्‍न न हों (मत्ति 12:44,45)। पवित्रता का जीवन एवं परमेश्‍वर की इच्‍छा में बना रहना आदेशित हैं (1यूह. 5:18)।

स्‍वर्गदूत

स्‍वर्गदूत

स्‍वर्गदूत अमर स्‍वर्गीय प्राणी हैं जिन्‍हे परमेश्‍वर ने बनाया (प्रकाश.19:10;22:8-9;कुलु.2:18;लूका 20:34-36)। उन्‍हे ‘सेवा टहल करनेवाली आत्‍माएं’ कहा गया है (इब्रा.1:14)। वे अलैंगिक एवं अनेक है (लूका 20:34-35; दानि.7:10; इब्रा.12:22)। स्‍वर्गदूतों के अलग-अलग प्रकार है। करूब परमेश्‍वर की वाटिका एवं उपस्थिति में नियूक्‍त किए गये हैं (उत्‍प. 3:24; निर्ग.25:22; यहे.28:13,14)। सेराफ (अर्थात ‘जलने वाले’) को हम यशायाह 6:2,3 में परमेश्‍वर की आराधना करते हुए देख सकते हैं। प्रधान स्‍वर्गदूत दो हैं, मीकाईल, जो योद्धक दूतों का प्रधान है (यहूदा 1:9; प्रकाश.12:7) एवं जिब्राईल, जो परमेश्‍वर का संदेशवाहक है (लूका 1:19; दा‍नि.8:16; 9:21)। स्‍वर्गदूत ‘चुने हुए स्‍वर्गदूतों’ के नाम से भी जाने जाते हैं क्‍योंकि उनका स्‍थान परमेश्‍वर की उपस्थिति में है (1तिम.5:21)। शैतान, जो अपने पतन के पूर्व अभिषिक्‍त करूब था, उसके बलवा के समय वे परमेश्‍वर के प्रति विश्‍वासयोग्‍य रहे।

स्‍वर्गदूतों के पास बुद्धि है (2शम.14:17; 1पत.1:12), वे परमेश्‍वर के आदेशों का पालन करते हैं (भजन 103:20), परमेश्‍वर के सम्‍मुख में आदरमय भक्ति के साथ खड़े रहते हैं (नहे.9:6; इब्रा.1:6), वे दीन हैं (2पत.2:11), सामर्थी हैं (भजन 103:20), एवं पवित्र हैं (प्रकाश.14:10)। वे परमेश्‍वर के सेवक हैं और परमेश्‍वर की ही आज्ञा के अनुसार कार्य करते हैं (इब्रा.1:14; भजन 103:20)।

सृष्टि

सृष्टि

बाईबल हमें यह सिखाती है कि परमेश्‍वर ने जगत एवं सारी वस्‍तुओं की सृष्टि छ: दिनों में किया (उत्‍प.1:2; निर्ग.20:11)। जो वस्‍तुएं आज दृश्‍यमान है वे अनदेखी बातों से अर्थात शून्‍य से सृजे गये (इब्र.11:3)। परमेश्‍वर ने जगत की सृष्टि आवश्‍यक्‍ता से नहीं परन्‍तु अपने ही स्‍वतंत्र और सार्वभौम इच्‍छा के अनुसार किया (प्रकाश.4:11)। परमेश्‍वर ने अंधकार और ज्‍योति दोनों को बनाया (यश.45:7; उत्‍प.1:3) – दोनों भौतिक हैं, पहला दूसरे की अनुपस्थिति हैं। परमेश्‍वर ने अंतर एवं समय की सृष्टि की (भजन 90:2 – ‘तू ने पृथ्‍वी और जगत की रचना (इब्रा. ख्‍़यूल – घुमाना, मोड़ना) की’)। परमेश्‍वर ने जगत की सृष्टि यीशु मसीह के लिए किया जो सारे वस्‍तुओं का वारिस हैं (कुलु.1:16-18; इफि.1:10)।

पवित्र आत्‍मा

पवित्र आत्‍मा

बाईबल में पवित्र आत्‍मा का वर्णन कई नामों से किया गया है, जैसे ‘परमेश्‍वर का आत्‍मा’ (उत्‍प.1:2), ‘सत्‍य का आत्‍मा’ (यूह.14:17), ‘पवित्र आत्‍मा‘ (लूका 11:13), ‘पवित्रता की आत्‍मा’ (रोम.1:4), एवं ‘सहायक’ (यूह.14:26)। पवित्र आत्‍मा सारे वस्‍तुओं का सृष्टिकर्ता एवं जीवन का दाता हैं (अय्यूब 33:4; भजन 104:30)। उसी ने पवित्र शास्‍त्र की लेखन को प्रेरणा दिया (2पत.1:21)। उसी के द्वारा जगत में परमेश्‍वर के अद्भुत वरदान परमेश्‍वर के लोगों के द्वारा प्रगट होते हैं (1शम.10:10; प्रेरित 10:38; 1कुरु.12)। वह आत्मिक बातों की समझ देता है (अय्यूब 32:8; यश.11:2)। वह परमेश्‍वर के दासों को अभिषिक्‍त करता है और उन्‍हे सेवकाई के लिए अलग करता है (प्रेरित 10:38; 1यूह.2:27)। वह यीशु मसीह का महान गवाह है जो संसार को पाप, धार्मिकता, एवं न्‍याय के विषय में निरुत्‍तर करता है (यूह.15:26; 16:8)। उसी के अंतरनिवास की परिपूर्णता (उससे भरे जाने) के द्वारा शिष्‍य सारे विश्‍व में मसीह के गवाह होने की सामर्थ प्राप्‍त करते हैं (प्रेरित 1:8)।

यीशु मसीह

यीशु मसीह

बाईबल हमें बताती है कि यीशु मसीह परमेश्‍वर का पुत्र है (यूह.3:16) जिसमें और जिस के द्वारा परमेश्‍वर हमें प्रगट हुआ (इब्रा.1:1,2)। वह परमेश्‍वर का वचन है (यूह.1:1), अदृश्‍य परमेश्‍वर का स्‍वरूप है (कुलु.1:15)। वह अजन्‍म है; उसका नाम ‘पुत्र’ से यह तात्‍पर्य नही कि उसका जन्‍म हुआ या वह सृजा गया; वह अनादि और अनंत है, वह परमेश्‍वर है (यूह.1:1)। परमेश्‍वर और मनुष्‍यों के बीच वही एकमात्र मध्‍यस्‍त है (1तिम.2:5)। परमेश्‍वर के विषय में जो कुछ हम जान सकते है वह केवल यीशु मसीह में और यीशु मसीह के द्वारा ही जान सकते हैं, क्‍योंकि उसमें ईश्‍वरत्‍व की परिपूर्णता सदेह वास करती है (कुलु.2:9; इब्रा.1:3)। वह परमेश्‍वर का तत्‍व का छाप है और इस जगत का सृष्टिकर्ता एवं पालनहारा है (कुलु.1:16; इब्रा.1:3)। वह परमेश्‍वर के अलावा दूसरा परमेश्‍वर नही परन्‍तु परमेश्‍वर है और परमेश्‍वर के साथ एक है (यूह.17:22) जो त्रिएक है। परमेश्‍वर पिता है, परमेश्‍वर पुत्र है, और परमेश्‍वर पवित्रात्‍मा है। लेकिन परमेश्‍वर तीन नही है। वह एक है। वे तीन एक है। यह कैसे हो सकता है? इसलिए क्‍योंकि परमेश्‍वर सत्‍य है, परमेश्‍वर आनंद है, एवं परमेश्‍वर प्रेम है। सत्‍य स्‍वरूप में वह ज्ञाता, ज्ञान का विषय, एवं सर्वज्ञानी आत्‍मा है। प्रेम के स्‍वरूप में वह प्रेमी, प्रिय, एवं प्रेम की आत्‍मा है। आनन्‍द स्‍वरूप में वह आनंदित, आनंद का विषय, एवं आनंद की आत्‍मा है। यीशु का अस्तित्‍व इब्रा‍हिम से पहले था (यूह.8:58)। यीशु जगत की सृष्टि से पहले था (यूह.1:1,2)। यीशु आनंत है।

सब कुछ यीशु के द्वारा और यीशु के लिए ही सृजा गया (कुलु.1:16)। वह परमेश्‍वर का वारिस है एवं सृष्टि में पहलौठा है (कुलु.1:15)। वह सृष्टि का मुक्तिदाता एवं जगत का उद्धारकर्ता है जिसके निमित वह मनुष्‍य बन गया (यूह.1:14) ताकि हमारे पापों का दण्‍ड चुकाये और परमेश्‍वर की धार्मिकता को पूरा करे (इब्रा.2:9-18)। वह मृतकों मे से जी उठा और नई सृष्टि का कर्ता बन गया ताकि जो कोई उसे विश्‍वास की आज्ञाकारिता के साथ ग्रहण करेगा वह उसके संग परमेश्‍वर का राज्‍य का वारिस ठहराया जाएगा। वह अंतिम दिन में जीवितों और मृतकों का न्‍याय करने आयेगा (2तिम.4:1)।

परमेश्‍वर

परमेश्‍वर

बाईबल हमें सिखाती है कि परमेश्‍वर जगत का सृष्टिकर्ता हैं (उत्‍प.1:1)। सृष्टिकर्ता के रूप में वह सृष्टि के समान नही हैं – अर्थात वह अजन्‍म, अनादी, एवं अनंत हैं (निर्ग.15:18; व्‍यवस्‍था.33:27)। बाईबल यह भी सिखा‍ती है कि परमेश्‍वर आत्‍मा है (यूह. 4:24)। किसी ने भी परमेश्‍वर को कभी नही देखा क्‍योंकि वह अदृश्‍य है (कुलु.1:15; 1तिम.1:17)। परमेश्‍वर सर्वोपस्थित है, (भजन 139:7-10), सर्वसामर्थी हैं (मत्ति 19:26), एवं सर्वज्ञानी है (लूका 12:2)।

परमेश्‍वर एक है, जिससे पहले तो यह तात्‍पर्य है कि वह अखण्‍ड है, फिर यह कि उसके तुल्‍य और कोई दूसरा नही जो ‘परमेश्‍वर’ नाम से जाना जा सके। एक ही परमेश्‍वर है (व्‍यवस्‍था.4:35)। परमेश्‍वर जीवन का दाता है (अय्यूब 33:4)। परमेश्‍वर जगत का शासक एवं न्‍यायाधीश है, जगत उसी का है (भजन 10:16)। वह मनुष्‍यों के हर विचार, वचन, एवं कर्मों का आंतिम न्‍याय के दिन में हिसाब लेगा (2 पत.3:7)।

बाईबल सभी मनुष्‍यों को आदेश देती है कि वे परमेश्‍वर के सम्‍मुख में अपने आप को भय, भक्ति, पापों से फिराव, एवं आज्ञाकारिता का विश्‍वास के साथ अपने आप को समर्पित करें (सभो.12:13; प्रेरित.17:30)।

बाईबल सिखाती है कि परमेश्‍वर हमारा पिता है (मत्ति6:9; प्रेरित.17:29) जो हमसे शाश्‍वत प्रेम करता है (यर्मि. 31:3)। वह नही चाहता है कि हम अपने पापों (उन बुरे विचारों एवं कार्यों के चलते जिसके हम दोषी है) में नाश हो जाए । इसलिए, परमेश्‍वर ने मानव रूप धारण किया ताकि क्रूस पर हमारे पापदण्‍ड सह कर उस बलिदान के द्वारा वह हमारे लिए एक उद्धार का मार्ग बनाएं। इ‍सलिए, परमेश्‍वर ही हमारा एकमात्र उद्धारकर्ता है (यहूदा 1:25)। जो कोई दिल से इस सच्‍चे परमेश्‍वर से प्रार्थना करता है, उसकी प्रार्थना तुरन्‍त सून ली जाती है क्‍योंकि परमेश्‍वर की उपस्थिति हर जगह पर है और वह हमारे स्‍वांस से भी अधिक हमारे करीब है (भजन 34:17; 130:1)। जो कोई उस परमेश्‍वर से कहता है कि ‘प्रभु, मै अपने पापों के कारण शर्मिंदा हूँ, मुझे माफ कर’, उसके पाप मिटा दिए जाते हैं (भजन 103:12)। यह क्षमा और जीवन में नई शुरुवात प्रभु यीशु मसीह (जो परमेश्‍वर का स्‍वरूप है और हमारे उद्धार के लिए आज से 2000 वर्ष पूर्व मानव रूप में प्रगट हुआ) के उस बलिदान के कारण हमे उपलब्‍ध किया गया  जिसके  द्वारा उसने पाप और मृत्‍यु के पुराने जगत का अंत किया और अपने पुनुरुत्‍थान (मृतकों में से तीसरे दिन जी उठने) के द्वारा हमारे लिए नया जीवन का प्रबन्‍ध किया।


Laugh!



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